Manish Sisodia का बड़ा फैसला: दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही का बहिष्कार और न्यायपालिका पर उठते सवाल

Manish Sisodia ने दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही का किया पूर्ण बहिष्कार

Manish Sisodia ने दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही का किया पूर्ण बहिष्कार

नई दिल्ली, 28 अप्रैल 2026: दिल्ली की राजनीति में आज एक नया और अभूतपूर्व मोड़ आया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री Manish Sisodia ने दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही का पूर्ण बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। यह फैसला तब आया है जब सिसोदिया ने अरविंद केजरीवाल के नक्शेकदम पर चलते हुए अदालत को एक पत्र लिखकर अपनी गहरी असहमति और न्याय के प्रति अविश्वास व्यक्त किया।

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न्यायालय की निष्पक्षता पर गंभीर आरोप

Manish Sisodia ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत को संबोधित करते हुए कहा कि वे अब सीबीआई (CBI) के ‘आबकारी नीति मामले’ की सुनवाई में न तो खुद पेश होंगे और न ही उनका कोई वकील उनकी पैरवी करेगा। सिसोदिया ने अपने पत्र में जस्टिस शर्मा की निष्पक्षता पर कई तीखे सवाल खड़े किए हैं:

  • हितों का टकराव (Conflict of Interest): Manish Sisodia ने उल्लेख किया कि जस्टिस शर्मा के बच्चे केंद्र सरकार के लीगल पैनल में कार्यरत हैं और सरकार की ओर से पेश होने वाले वकीलों के साथ उनके कथित करीबी संबंध हैं。
  • सार्वजनिक उपस्थिति: उन्होंने जज की ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ (ABAP) जैसे संगठनों के कार्यक्रमों में बार-बार मौजूदगी पर भी आपत्ति जताई, जिसे उन्होंने पक्षपात की आशंका का आधार बताया。
  • अंतरात्मा की आवाज़: सिसोदिया ने पत्र में लिखा कि उनकी अंतरात्मा उन्हें ऐसी कार्यवाही का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं देती, जहाँ न्याय न केवल निष्पक्ष हो, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए。

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सत्यग्रह: कानूनी लड़ाई से वैचारिक विरोध तक

कानूनी प्रक्रिया से हटने के अपने फैसले को Manish Sisodia ने “सत्यग्रह” का नाम दिया है। उन्होंने महात्मा गांधी के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि जब न्यायिक प्रणाली के एक हिस्से से उम्मीद खत्म हो जाए, तो शांतिपूर्ण विरोध ही एकमात्र विकल्प बचता है। गौरतलब है कि इससे एक दिन पहले ही अरविंद केजरीवाल ने भी इसी तरह का कदम उठाया था, जिससे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है。

मनीष सिसोदिया और दिल्ली का शिक्षा मॉडल

भले ही वर्तमान में Manish Sisodia कानूनी चुनौतियों का सामना कर रहे हों, लेकिन भारतीय राजनीति में उनकी पहचान एक ‘शिक्षा सुधारक’ के रूप में अमिट है। उनके नेतृत्व में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में जो बदलाव आए, उन्हें वैश्विक स्तर पर ‘दिल्ली एजुकेशन मॉडल’ के रूप में सराहा गया है।

  1. बजट में ऐतिहासिक वृद्धि: शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने दिल्ली के कुल बजट का लगभग 25% हिस्सा शिक्षा के लिए आवंटित किया, जो देश के किसी भी राज्य द्वारा दिया गया सबसे बड़ा हिस्सा है。
  2. बुनियादी ढांचे का कायाकल्प: टूटे हुए कमरों वाले स्कूलों को उन्होंने स्मार्ट क्लासरूम, स्विमिंग पूल और आधुनिक खेल मैदानों वाले वर्ल्ड-क्लास संस्थानों में बदल दिया。
  3. नवाचारी पाठ्यक्रम: उन्होंने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य के लिए ‘हैप्पीनेस करिकुलम’ (Happiness Curriculum) और ‘एंटरप्रेन्योरशिप माइंडसेट करिकुलम’ (Entrepreneurship) जैसे सफल प्रोग्राम शुरू किए。
  4. शिक्षक प्रशिक्षण: सिसोदिया ने दिल्ली के शिक्षकों को विश्व स्तरीय प्रशिक्षण के लिए फिनलैंड, कैम्ब्रिज और सिंगापुर जैसे देशों में भेजा, जिससे शिक्षण की गुणवत्ता में क्रांतिकारी सुधार हुआ。

विवाद और कानूनी संघर्ष का सफर

मनीष सिसोदिया के राजनीतिक जीवन में 2022 के बाद से काफी उथल-पुथल रही है। दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 में कथित अनियमितताओं के आरोप में सीबीआई ने फरवरी 2023 में उन्हें गिरफ्तार किया था。 इस मामले की वजह से उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा और वे लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहे। हालांकि, अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी थी, लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने फिर से इस कानूनी लड़ाई को सुर्खियों में ला दिया है。

राजनीतिक भविष्य और चुनौतियाँ

सिसोदिया का बहिष्कार का फैसला ऐसे समय में आया है जब दिल्ली में 2025 के चुनाव के बाद की राजनीतिक हलचलें और 2026 की कानूनी पेचीदगियां चरम पर हैं। ‘आप’ के शीर्ष नेतृत्व का न्यायपालिका के एक हिस्से के प्रति यह असहयोग आंदोलन आने वाले समय में एक बड़ा संवैधानिक मुद्दा बन सकता है。

निष्कर्ष

मनीष सिसोदिया आज केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक विचार के प्रतीक बन चुके हैं जो शिक्षा और शासन में बदलाव की वकालत करता है। जहाँ उनके समर्थक उन्हें ‘शिक्षा क्रांति का नायक’ मानते हैं, वहीं उनके विरोधी उन्हें कानूनी घेरे में खड़ा देखते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही का बहिष्कार करना उनकी राजनीति का एक बड़ा और जोखिम भरा दांव है, जिसका परिणाम भविष्य की अदालती कार्यवाहियों और जनता के मत पर निर्भर करेगा।